Aasan Kise Kahate Hain

Aasan Kise Kahate Hain

Aasan Kise Kahate Hain: हेलो स्टूडेंट्स, आज हमने यहां पर आसन की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण के बारे में विस्तार से बताया है।Aasan Kise Kahate HainHain यह हर कक्षा की परीक्षा में पूछा जाने वाले यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

Aasan Kise Kahate Hain

आसन शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त होता है जैसे शरीर के द्वारा बनाये गये विशेष स्थिति, बैठने का विशेष तरीका, हाथी के शरीर का अगला भाग, घोडे़ का कन्धा आदि परन्तु हठयोग में आसन शब्द का अर्थ मन को स्थिर करने हेतु बैठने की विशेष स्थिति माना जाता है।

महर्षि पतंजलि आसन की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि – ‘‘स्थिरसुखमासनम्’’ योगसूत्र 2/46 अर्थात् जिस स्थिति में व्यक्ति स्थिरता एवं सुखपूर्वक लम्बे समय तक बैठे उसे आसन कहते हैं।

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आसन किसे कहते हैं?

स्थिर और सुखकर शारीरिक स्थिति मानसिक संतुलन लाती है और मन की चंचलता को रोकती है। आसनो की प्रारंभिक स्थिति में अनेक प्रकारान्तरों के द्वारा अपने शरीर को अन्तिम स्थिति के अभ्यास के लिए तैयार किया जाता है।Aasan Kise Kahate Hain महर्षि घेरण्ड, घेरण्ड संहिता में आसनों के सन्दर्भ में बताते हैं कि इस संसार में जितने जीव-जंतु हैं, उनके शरीर की जो सामान्य स्थिति है, उस भंगिमा का अनुसरण करना आसन कहलाता है।

भगवान् शिव ने चौरासी लाख आसनों का वर्णन किया है। उनमें से चौरासी विशिष्ट आसन हैं ओर चौरासी आसनों में से बत्तीस आसन मृत्यु लोक के लिए आवश्यक माने गये हैं।

महर्षि पतंजलि ने आसन शरीर को स्थिर और सुखदायी रखने की तकनीक के रूप में बताया है।

आसन शब्द का अर्थ एवं परिभाषा

आसन शब्द संस्कृत भाषा के ‘अस’ धातु से बना है जिसके दो अर्थ हैं- पहला है ‘बैठने का स्थान’ तथा दूसरा ‘शारीरिक अवस्था’।

  • बैठने का स्थान
  • शारीरिक अवस्था

बैठने का स्थान का अर्थ है जिस पर बैठते हैं जैसे-मृगछाल, कुश, चटाई, दरी आदि का आसनAasan Kise Kahate Hain। आसन के दूसरे अर्थ से तात्पर्य है शरीर, मन तथा आत्मा की सुखद संयुक्त अवस्था या शरीर, मन तथा आत्मा एक साथ व स्थिर हो जाती है और उससे जो सुख की अनुभूति होती है वह स्थिति आसन कहलाती है। आसन अर्थात् जब हम किसी स्थिर आसन में बैठेंगे तभी योग साधनाएं कर सकते है।

आसन की सिद्धी

महर्षि पतंजलि ने आसन की सिद्धी के सन्दर्भ में स्पष्ट करते हुए कहा है कि -प्रयत्नषैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ।। योग सूत्र 2/47 प्रयत्न की शिथिलता से तथा अनंत परमात्मा में मन लगाने से सिद्ध होता है। आसन की सिद्धी से संबंधित विभिन्न व्याख्याकारों ने जो व्याख्या की है वह इस प्रकार है- व्यास भाष्य के अनुसार – प्रयत्नोपरम् से आसन सिद्धि होती है।

स्वामी हरिहरानंद के अनुसार – आसन सिद्धि अर्थात् शरीर की सम्यक् स्थिरता तथा सुखावस्था प्रयत्नशैथिल्य और अनंत समापत्ति द्वारा होती है।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार – अनंत के चिंतन द्वारा आसन स्थिर हो सकता है।Aasan Kise Kahate Hain स्पष्ट है कि आसन तभी सिद्ध कहलाता है जब स्थिरता व प्रयत्न की शिथिलता अर्थात् अभाव होगा क्योंकि प्रयत्न करने पर स्थिर सुख का लाभ प्राप्त नही हो सकता है न हीं स्थिरता के भाव प्राप्त हो सकते है।

अत: जैसे-जैसे हम शरीर को स्थिर रखने का प्रयास करेंगे वैसे-वैसे हम शरीर भाव से ऊँचे उठेंगे। यह अनंत के चिंतन द्वारा ही संभव है।

आसन का परिणाम

जब आसन के अभ्यास से स्थिरता का भाव आ जाएगा वो हमें किसी भी प्रकार का दु:ख द्वन्द्व आदि हमें विचलित नही कर पायेंगे। इसे ही महर्षि पतंजलि ने आसन के फल के रूप में स्पष्ट करते हुए कहा है कि ततो द्वन्द्वानभिघात: ।। पातंतज योग सूत्र 2/48 उस आसन की सिद्धि से जाड़ा-गर्मी आदि द्वन्द्वों का आघात नहीं लगता। आसन के फल से संबंधित विभिन्न व्याख्याकारों ने जो व्याख्या की है वह इस प्रकार है- व्यास भाष्य- आसन जय के कारण शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों द्वारा (साधक) अभिभूत नहीं होता।

स्वामी हरिहरानंद- ‘‘आसनस्थैर्य के कारण शरीर में शून्यता आ जाती है’’ स्पष्ट है कि जब हम आसन सिद्ध कर लेंगे तो हमें शुभ-अशुभ सुख-दुख, गर्मी-ठण्डी आदि भाव नही सतायेंगे। हम बोधशून्य हो जाते हैं।Aasan Kise Kahate Hain क्योंकि पीड़ा एक चंचलता ही है और आसन सिद्धि तो चंचलता की समाप्ति होने पर ही हो सकती है अत: हममें यह चंचलता रूपी पीड़ा का भान नही होता है हम कसी भी स्थिति मे सुख व शांत होते हैं।

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आसन का महत्व

आसनों का मुख्य उद्देश्य शारीरिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्ति दिलाना है। आसन से शरीर के जोड़ लचीले बनते हैं। इनसे शरीर की माँसपेशियों में खिंचाव उत्पन्न होता है जिससे वह स्वस्थ होती हैं तथा शरीर के विशाक्त पदार्थों को बाहर निकालने की क्रिया संपन्न होती है।Aasan Kise Kahate Hain आसन से शरीर के आंतरिक अंगों की मालिश होती है जिससे उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है। आसन शरीर के मर्म स्थानों में रहने वाली ‘हव्य वहा’ व ‘कव्य वहा’ विद्युत शक्ति को क्रियाशील रखते हैं।Aasan Kise Kahate Hain आसनों का सीधा प्रभाव शरीर की नस-नाड़ियों के अतिरिक्त सुक्ष्म कशेरुकाओं पर भी पड़ता है। आसनों के अभ्यास से आकुंचन और प्रकुंचन द्वारा शरीर के विकार हट जाते हैं। आसन से शारीरिक संतुलन के साथ-साथ भावनात्मक संतुलन की प्राप्ति होती है।

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