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land kise kahate hain – भूमि किसे कहते हैं?

land kise kahate hain- हेलो स्टूडेंट्स, आज हमने यहां पर भूमि की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण (land kise kahate hain ) के बारे में विस्तार से बताया है। यह हर कक्षा की परीक्षा में पूछा जाने वाले यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

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भूमि हमें कृषि, आवास और विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक संसाधन प्रदान करता हैं। जो मानव जीवन के लिए अति आवश्यक हैं। पृथ्वी की सतह का लगभग 29.2% भाग मैदान, पहाड़, चट्टान, मरुस्थल और हिमनद से मिलकर बना हैं। पृथ्वी की सतह पर 510 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र है, लेकिन इसमें से 30% से भी कम भूमि द्वारा कवर किया गया है। बाकी पानी है।

भूमि किसे कहते हैं?

भूमि पृथ्वी की ठोस सतह है, जो स्थायी रूप से पानी से अलग होती है। लेकिन अधिकांश भूमि ऐसे भी है जो समुद्र तल से कम ऊंचाई पर स्थित है। भूमि में मुख्य रूप से चट्टान, रेत, मिट्टी और बर्फ पाए जाते हैं। पूरे इतिहास में मानव ने इसी भूमि पर अपना सफर तय किया हैं।

भूमि क्षेत्र देश की भूमि के कुल सतह क्षेत्र को संदर्भित करता है। पृथ्वी का कुल समतल भूमि क्षेत्र लगभग 148,939,063.13 किमी 2 है जो कि इसकी कुल सतह का लगभग 29.2% है। जिसमें बर्फ से ढकी हुई भूमि भी शामिल है। जल पृथ्वी की सतह के लगभग 70.8% भाग को कवर करता है।

भूमि जलवायु के साथ परस्पर क्रिया करती है और जलवायु को अत्यधिक प्रभावित करती है क्योंकि भूमि की सतह गर्म होती है और हवा या पानी की तुलना में तेजी से ठंडी होती है। अक्षांश, ऊंचाई, स्थलाकृति और परावर्तन सभी के अलग-अलग प्रभाव होते हैं।  पृथ्वी पर वायु प्रवाह और वर्षा को बनाने और बदलने में भूमि की ऊंचाई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बड़े भू-आकृतियां, जैसे कि पर्वत श्रृंखलाएं, पवन ऊर्जा को मोड़ती हैं और वायु को कम घना और कम गर्मी धारण करने में सक्षम बनाती हैं। जैसे ही हवा ऊपर उठती है वह ठंडी land kise kahate hain होती है और वर्षा का कारण बनती हैं।

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कृषि भूमि किसे कहते हैं

कृषि भूमि आम तौर पर कृषि के लिए समर्पित भूमि है, जीवन के अन्य रूपों का व्यवस्थित और नियंत्रित उपयोग विशेष रूप से पशुओं का पालन और फसलों का उत्पादन मनुष्यों के लिए भोजन का उत्पादन करने के लिए कृषि भूमि सबसे मत्वपूर्ण होता हैं। यह आम तौर पर खेत या फसल के साथ-साथ चरागाह भी होता है।

कृषि योग्य भूमि जिसे फसल भूमि के रूप में भी जाना जाता है। उसमे कई प्रकार की फसलों का उत्पादन किया जाता हैं। कृषि भूमि 2011 तक दुनिया के 38.4% भूमि क्षेत्र को कवर करती है। स्थायी चारागाह सभी कृषि भूमि का 68.4% हैं जबकि कृषि योग्य भूमि का प्रतिसत 28.4 है। स्थायी फसलें कुल भूमि का 3.1% कवर करता हैं

भूमि का वर्गीकरण

1. वन :-

भारतीय अर्थव्यवस्था की भौगोलिक स्थिति, भौतिक संरचना और विविध प्रकार की जलवायु, विभिन्न प्रकार की वृक्ष और वनस्पतियों के उद्गम और विकास की पोषक है। इसी कारण भारत में विभिन्न प्रकार की वन और वनस्पतियाँ पायी जाती हैं। मानव सभ्यता के प्रत्येक चरण में वनों में स्वतंत्र चर के रूप में जीवन और वनस्पति जगत को आश्रय दिया है। वन संपदा के इसी आधारित महत्त्व के कारण इनके संवर्धन और संरक्षण का दायित्व समाज पर नीति वचनों और धर्म वाक्यों के द्वारा डाला गया था इसका प्रभाव इस स्तर तक रहा कि वृक्षा रोपण और उसके प्रभावी विकास प्रयास को पुत्र से भी अधिक श्रेयस्कर माना जाने लगा था प्रकृति की उदारता और वनों के प्रति अनुकूल सामाजिक दृष्टिकोण के कारण वर्तमान उपभोक्तावादी सभ्यता से पूर्व भारत भूमि वन रूप हरित कवच से आच्छादित और आभूषित थी, वन, वन्यजीव और मनुष्य का अद्भुत समन्वय था। land kise kahate hain: प्राकृतिक पर्यावरण नितांत मनोरम और संतुलित था परंतु पिछले लगभग तीन सौ वर्षों में मनुष्य अपने तत्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये वनों का अत्यंत निर्दयतापूर्वक शोषण और विनाश किया है।

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2. गैर कृषि प्रयोग में प्रयुक्त भूमि :-

इस शीर्षक में उन भूमियों को सम्मिलित किया जाता है जो भवन, सड़क, रेलमार्ग आदि के प्रयोग में हैं, इसी प्रकार वे भूमियाँ जो जल प्रवाहों, नदियों या नहरों के अंतर्गत हैं, भी इस वर्ग में सम्मिलित हैं इसके अतिरिक्त अन्य गैर कृषि प्रयोगों की भूमियाँ भी इसके अंतर्गत सम्मिलित होती हैं।

3. बंजर और गैर कृषि योग्य भूमियाँ :-

इस श्रेणी में वे सभी भूमियाँ सम्मिलित हैं जो बंजर हैं या कृषि योग्य नहीं है। इस कोटि में पर्वतीय, पठारी और रेगिस्तानी भूमियाँ आती हैं। इन भूमियों को अत्यधिक लागत के बिना फसलों के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता है। बंजर और गैर कृषि योग्य भूमियाँ कृषि क्षेत्र के मध्य हो सकती हैं या इसके पृथक क्षेत्र में हो सकती है।

4. स्थायी चारागाह :-

इसके अंतर्गत चराईवाली सभी भूमियाँ सम्मिलित हैं। इस प्रकार की भूमियाँ घास स्थली हो सकती हैं या स्थायी चारागाह के रूप में। ग्राम समूहों के चारागाह भी इसी कोटि में आते हैं।

5. विविध वृक्षों एवं बागों वाली भूमियाँ :-

इस कोटि में कृषि योग्य वह सभी भूमियाँ सम्मिलित की जाती हैं जिन्हें शुद्ध कृषि क्षेत्र में सम्मिलित नहीं किया जाता है। किंतु कतिपय कृषिगत प्रयोग में लायी जा सकती हैं। इसके अंतर्गत छोटे पेड़ छावन वाली घासें बांस की झाड़ ईंधन वाली लकड़ी के वृक्ष सम्मिलित किये जाते हैं जो भूमि के उपयोग वितरण में बागान शीर्षक में सम्मिलित नहीं है।

6. कृषि योग्य व्यर्थ भूमि :-

इस श्रेणी में वह भूमि सम्मिलित है जो खेती के लिये उपलब्ध है परंतु जिस पर चालू वर्ष और पिछले पाँच वर्षों या उससे अधिक समय से फसल नहीं उगाई गयी है ऐसी भूमियाँ परती हो सकती हैं या झाड़ियों और जंगल वाली हो सकती हैं, land kise kahate hain: यह भूमियाँ किसी अन्य प्रयोग में नहीं लायी जा सकती है वह भूमि जिससे एक बार खेती की गयी है परंतु पिछले पाँच वर्षों से खेती नहीं की गयी वह भूमियाँ भी इसी श्रेणी में आती हैं।

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7. वर्तमान परती भूमि :-

इसी श्रेणी में वह कृषित क्षेत्र सम्मिलित किया जा सकता है जिसे केवल चालू वर्ष में परती रखा जाता है, उदाहरण के लिये यदि किसी पौधशाला वाले क्षेत्र को उसी वर्ष पुन: किसी फसल के लिये प्रयोग नहीं किया जाता तो उसे चालू परती कहा जाता है।

8. अन्य परती भूमि :-

अन्य परती भूमि के अंतर्गत वे भूमियाँ हैं जो पहले कृषि के अंतर्गत थी परंतु अब स्थायी रूप से एक वर्ष की अवधि से अधिक परंतु 5 वर्ष की अवधि से कम अवधि से खेती के अंतर्गत नहीं है। जमीन का खेती से बाहर होने के कई कारण हो सकते हैं। land kise kahate hain: यथा कृषकों की गरीबी, पानी की अपर्याप्त पूर्ति, विषम जलवायु, नदियाँ और नहरों की भूमियाँ और खेती का गैर लाभदायक होना आदि।

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