Parjivi Kise Kahate Hain

Parjivi Kise Kahate Hain

Parjivi Kise Kahate Hain:हेलो स्टूडेंट्स, आज हमने यहां पर परजीवी की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण के बारे में विस्तार से बताया है।Parjivi Kise Kahate Hain यह हर कक्षा की परीक्षा में पूछा जाने वाले यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

“परजीवी” शब्द ग्रीक शब्द पैरासिटोस से आया है , जिसका अर्थ है “वह जो दूसरे की मेज पर खाता हैParjivi Kise Kahate Hain।” परजीवी और परजीवी के अध्ययन को परजीवी विज्ञान कहा जाता है।

Parjivi Kise Kahate Hain

परजीवी ऐसे जीव हैं जो अपने परपोषी पर कुछ समय, या समस्त जीवन, जीवनयापन करते हैंParjivi Kise Kahate Hain। इन्हें परपोषी से ही आहार तथा संरक्षण प्राप्त हो जाता है। परजीवी सामान्यतः छोटे होते हैं और परपोषी (host) अपेक्षाकृत बड़े।Parjivi Kise Kahate Hain परजीवियों को अन्य जीवों की भाँति खाद्य की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे खाद्यों में नाइट्रोजन या जीवद्रव्य (protoplasm) का होना अत्यावश्यक है। इसे इन्हें मिलना चाहिए। कुछ परजीवी पौधों से या अन्य जीवों के प्रोटीन से, नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं। कुछ परजीवी मृत पौधों या मृत जन्तुओं से खाद्य प्राप्त करते हैंParjivi Kise Kahate Hain। कुछ परजीवी अन्य जीवों को भक्षण कर नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं।Parjivi Kise Kahate Hain कुछ परजीवी पौधों के रसों या जन्तुओं के रुधिर से खाद्य प्राप्त करते हैं। कुछ के पास ऐसे साधन होते हैं कि वे स्वयं पौधों या जंतुओं में छेदकर उनसे रस या रुधिर प्राप्त कर अपना निर्वाह करते हैं।

परजीवी बहुत विस्तृत, वनस्पति या जांतव जगत में पाए जाते हैं।Parjivi Kise Kahate Hain अधिकांश परजीवी विषाणु, दंडाणु, और कवक वर्ग के, अथवा प्रोटोज़ोआ, कृमि तथा ऐंथ्रोपॉड किस्म के जीव होते हैं (देखें, दंडाणु, विषाणु, कवक)। परजीवी विषाणुओं तथा दंडाणुओं से पौधों और मनुष्यों में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं (देखें, परजीविता)। परजीवी कवकों से फसलों के अनेक रोग, केंदवा, रितुआ, फफूंदी, अंगमारी इत्यादि और मनुष्यों के चर्मरोग, दाद आदि, होते हैं।Parjivi Kise Kahate Hain परजीवी प्रोटोज़ोआ से मलेरिया, ऐमीबिक पेचिश और अफ्रीकी सुप्त रोग आदि होते हैं।

परजीवियों का जीवनचक्र बड़ा पेचीदा होता हैParjivi Kise Kahate Hain। इनमें अनेकों का, विशेषतः रोगोत्पादक परजीवियों का, अध्ययन बड़े विस्तार से हुआ है, जैसे ये कहाँ बनते, कैसे बनते, कैसे अंडे देते और कैसे फैलते हैं, रोगों की रोकथाम के लिये इनका अध्ययन बड़ा आवश्यक है।Parjivi Kise Kahate Hain इनकी आकारिकी (morphology) का भी अध्ययन विस्तार से हुआ है। ये कैसे उत्पन्न होते, कैसे रहते, कैसे बढ़ते हैं, इन सब बातों का अध्ययन इसलिए आवश्यक है कि आवश्यकता पड़ने पर इनकी वृद्धि रोकी जा सके।Parjivi Kise Kahate Hain परजीवियों के उपापचय का भी अध्ययन हुआ है। अनेक परजीवी बैक्टीरिया विटामिनों का सृजन नहीं करते। विटामिनों के लिये उन्हें परपोषियों पर निर्भर रहना पड़ता है।Parjivi Kise Kahate Hain परपोषी पर निर्भर रहने के कारण वे अपने आवश्यक खाद्य को स्वयं संश्लेषण करने में असमर्थ होते हैं। Parjivi Kise Kahate Hainऐसा विशेष रूप से विषाणुओं में देखा जाता है। विषाणुओं को जीवित कोशिकाओं के बाहर उत्पन्न करना सम्भव नहीं है। सामान्य अर्थ में कुछ विषाणुओं का हम जीवित होना भी नहीं कह सकते। ये परपोषी के उपापचय तंत्र के सहयोग से ही जीवित रहते और पनपते हैं।

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पारजैविकी के प्रकार

इन विभिन्न प्रकार के जीवों के अध्ययन में; विषय, छोटी व साधारणत: इकाईयों में बँट जाता है, जिन पर अधिक ध्यानाकर्षण होता है, व जो समान तकनीकें प्रयोग करते हैं, भले ही अध्ययनकर्ता समान रोग या जीवों का अध्ययन ना कर रहें हों।Parjivi Kise Kahate Hain इस विज्ञान में अत्यधिक शोध के परिणामस्वरूप यह इन दो या अधिक परिभाषाओं से वर्णित हो पाता है। सामान्यतः प्रोकैर्योट्स का अध्ययन जीवाणु विज्ञान के अन्तर्गत आता है, ना कि परजीवी विज्ञान के।

  • आयुर्विज्ञान पारजैविकी  

परजीवी विज्ञान की प्राचीनतम श्रेणी, आयुर्विज्ञान या चिकित्सा क्षेत्र से संबंधित हैParjivi Kise Kahate Hain। यह मानव को प्रभावित/संक्रमित करने वाले परजीवियों का अध्ययन होता है। इसमें निम्न क्षेत्र आते हैं:-

एककोशिकीय जीवों का अध्ययन

(प्रोटोज़ोऑलोजी), जैसे प्लाज़मोडियम स्पीशीज, जिससे मलेरिया होता है।Parjivi Kise Kahate Hain चार भिन्न प्रकार के मलेरिया परजीवी हैं, प्लाज़मोडियम फैल्सिपैरम (Pl.falciparum), प्लाज़मोडियम मैलेराय (Pl.malariae), प्लाज़मोडियम वाइवैक्स (Pl.vivax) & प्लाज़मोडियम ओवेल (Pl.ovale)।

लिश्मेनिया डोनोवानी (Leishmania donovani), एककोशीकीय जीव, जिससे लेइश्मेनियैसिस होता है।

बहुकोशिकीय जीवों का अध्ययन (हैल्मिंथोलॉजी), जैसे स्किस्टोसोमा स्पीशिज़, व्यूचेरेरिया बैन्क्रॉफ्टी एवं हुकवर्म।

चिकित्सा परजैविकी से औषधि विकास, महामारी विज्ञान व ज़ूनोसिस (पशुजनित रोगों) के अध्ययन संबंधित हैं।

  • पशु परजैविकी

जो परजीवी कृषि आदि को आर्थिक हानि पहुँचाते हैं, या पशुओं में संक्रमण करते हैं; उनका अध्ययन पशु परजैविकी कहलाता हैParjivi Kise Kahate Hain। इसमें अधय्यन की जाने वाली प्रजातियों में से कुछ हैं:

ल्यूसीलिया सेरिकैटा, एक मक्षिका, जो फार्म के पशुओं की खाल पर अण्डे देती हैParjivi Kise Kahate Hain। इनमें से कीड़े निकल कर, खाल में छेद करके अंदर मांसपेशियों तक घुस जाते हैं, व पशु को परेशान करते हैं।

ओटोडैक्टेस साइनोटिस, एक बिल्ली, जो सैंकर के लिये उत्तरदायी है।

जायरोडैक्टाइलस सैलेरिस , साल्मन का एक मोनोजीनियन परजीवी, जो कि अप्रतिरोधी होने पर एक पूरे के पूरे साल्मन समाज को ही नष्ट कर देता है।

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  • परिमाणात्मक पारजैविकी     

होस्ट (आतिथेय) विशिष्टों के बीच, परजीवी एक संग्रहीत वितरण दर्शाते हैं, इस प्रकार परजीवियों का बाहुल्य, अल्पसंख्यक होस्ट में रहते हैं। इस गुण के कारण, पारजीविज्ञ उन्नत जैवसंख्यिकी प्रणालियां प्रयोग कर सकते/पाते हैं।

  • संरचनाकृत पारजैविक

यह परजीवियों के प्रोटीनों की संरचना का अध्ययन होता हैParjivi Kise Kahate Hain। पारजैविक प्रोटीन संरचना का निर्धारण यह जानने में मदद करता है, कि ये प्रोटीन किस प्रकार मानवों में उपस्थित होमोलॉगस प्रोटीनों से भिन्न कार्यरत है। साथ ही प्रोटीन संरचना औषधि खोज की प्रक्रिया में सहायक होतीं हैं।

  • परजीवी पारिस्थितिकी

परजीवी होस्ट जनसंख्या पारिस्थितिकी के बारे में सूचना भी उपलब्ध कराते हैं।Parjivi Kise Kahate Hain मत्स्य उद्योग जैविकी में, उदा० परजीवी समुदाय को समान मत्स्य उपजाति की विशिष्ट जनसंख्या को पहचानने के लिये प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही परजीवियों में विशेष गुणों की संगति तथा जीवन शैली होती है, जो उन्हें होस्ट में स्थान बनाने को अग्रसर करती व सहायक होतीं हैं।Parjivi Kise Kahate Hain पारजैविक पारिस्थितिकी के पहलुओं को समझना होस्ट द्वारा परजीवी से बचने की रणनीति पर प्रकाश डाल सकता है।

  • टैक्सोनोमी एवं फायलोजैनेटिक्स

परजीवियों में वृहत भिन्नता, जीव वैज्ञानिकों के लिये उनका वर्णन करना तथा उन्हें नामावली बद्ध करना एक बड़ी चुनौती उपस्थित करती है। हाल ही में हुए विभिन्न जातियों को पृथक करने, पहचानने व विभिन्न टैक्सोनॉमी पैमानों पर उनके विभिन्न समूहों के बीच संबंध ढ़ूढने हेतु डी॰एन॰ए॰ प्रयोग पारजैवज्ञों के लिये अत्यधिक महत्वपूर्ण व सहायक रहे हैं।

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