Viram Chinh Kise Kahate Hain

Viram Chinh Kise Kahate Hain-विराम चिन्ह् किसे कहते है?

Viram Chinh Kise Kahate Hain:हेलो स्टूडेंट्स, आज हमने यहां पर विराम चिन्ह् की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण के बारे में विस्तार से बताया हैViram Chinh Kise Kahate Hain । यह हर कक्षा की परीक्षा में पूछा जाने वाले यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

Viram Chinh Kise Kahate Hain

परिभाषा – भाषा के लिखित रूप में अभिव्यक्ति को सरल, सहज, रोचक और स्पष्ट बनाने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें विराम चिह्न कहते है।

विराम शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है- ठहराव अथवा रुकना। अभिव्यक्तियों की पूर्णता हेतु वक्ता द्वारा बोलते समय शब्दों पर कहीं जोर देना पड़ता है, कभी ठहरना पड़ता है और कभी-कभी विशेष संकेतों का सहारा भी लेना पड़ता है।

लेखक भी संकेतों का सहारा लेता है जिससे पाठक इनकी सहायता से ठहर-ठहर कर, कुछ विराम लेकर लेखक के भावों से परिचित हो सके।

1 . ‘रोको, मत जाने दो।

2 . ‘रोको मत, जाने दो।’

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(1). अल्पविराम ( , )

अल्पविराम का अर्थ होता है थोड़ा ठहराव , थोड़ी देर

के लिए रुकना। इसका प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है —

1). यदि वाक्य के बीच में — पर , परन्तु , किन्तु , लेकिन , तो , भी , मगर , इसलिए , अतः , क्योंकि , जिससे , वरन् , बल्कि , तथापि आदि अव्यय हों , तो उनके पहले।

जैसे — बोलो , मगर धीरे से ।

वह आया , लेकिन चला गया ।

सिर्फ पढ़ो ही नहीं , वरन् काम भी करो ।

2). यदि एक ही प्रकार के शब्द या वाक्यांश आएँ। — जैसे — शब्दों में — राम , श्याम , मोहन और सोहन दोस्त हैं।

वाक्यांशों में — वह यहाँ आता है , पढ़ता है और चला जाता है।

3). यदि वाक्य में — यह , उसे , तब , अब , या , तो आदि लुप्त हों। जैसे —

मैं जो कहता हूँ , ध्यान से सुनो । (‘उसे’ — लुप्त है)

कब वह गया , कह नहीं सकता । (‘यह’ — लुप्त है)

जब जाना ही है , चले जाओ । (‘तो’ – लुप्त है)

4). यदि वाक्य का आरंभ — हाँ , नहीं , बस , अच्छा , सचमुच , वस्तुतः , छिः आदि से हो। जैसे —

हाँ , मैं जानता हूँ।                       नहीं , यह तो गलत है।

सचमुच , वह इतना बुद्धिमान् है ?  छिः , यह क्या कर दिया ?

नोट — अंतिम वाक्य में विस्मयादिबोधक-चिह्न भी आ सकता है। जैसे छिः ! यह क्या कर दिया !

5). संबोधन के बाद इस चिह्न का प्रयोग करें। — जैसे — अरे मित्र , तुम कहाँ गये थे ?

देशवासियो , मेरे हाथ मजबूत करें ।

नोट — संबोधनकारक में संज्ञा के बहुवचन रूप रहने पर भी अनुस्वार ( ‘ ) का प्रयोग न करें।

जैसे —

प्यारी बहनों, देवियों और सज्जनों, हे बालकों — अशुद्ध।

प्यारी बहनो, देवियो और सज्जनो, हे बालको — शुद्ध।

6). यदि शब्द को दो-तीन बार दोहराना हो। — जैसे —

नहीं , नहीं , मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकता ।

चलो , चलो , यहाँ कुछ नहीं मिलेगा ।

वह दूर से , बहुत दूर से आया था ।

7). तिथि में इसका प्रयोग होता है। — जैसे —

15 अगस्त , 1947 को हमारा देश आजाद हुआ ।

वह 14 जुलाई , 2001 को आया था।

8). पत्र में संबोधन के बाद इसका प्रयोग होता है। — जैसे —

प्रिय सुरेश ,

            खुश रहो ।

9). किसी की उक्ति के पहले — ‘ कि ‘ के स्थान पर। — जैसे — सोहन ने कहा कि मैं दिल्ली जाऊँगा ।

सोहन ने कहा , मैं दिल्ली जाऊँगा ।

10). नाम , ओहका और पता में प्रत्येक पद के बाद इसका प्रयोग करें। — जैसे —

(क) प्रो . एस . के . सिंह , प्राध्यापक , हिन्दी विभाग , पटना विश्वविद्यालय , पटना , मेरे मित्र हैं ।

(ख) वह , कंकड़बाग , पटना , बिहार का रहनेवाला है ।

(2). अर्द्धविराम ( ; )

अल्पविराम से अधिक और पूर्णविराम से कम ठहराव के लिए इस चिह्न का प्रयोग होता है। इसके निम्नलिखित प्रयोग हैं।

1). जहाँ मुख्य वाक्य और समानाधिकरण का संबंध बहुत अधिक न हो। ऐसे वाक्यों के बीच संबंध न होते हुए भी कुछ-न-कुछ संबंध अवश्य रहता है। जैसे —

नदी के किनारे टहल रहा था ; मंद – मंद हवा बह रही थी। हमलोग बातों में मशगूल थे कि सहसा एक चीख सुनायी पड़ी।

2). यदि मुख्य वाक्य के परिणाम की व्याख्या अन्य वाक्यों से करनी हो। जैसे —

बड़े ऑफिसर के आते ही ऑफिस का परिदृश्य बदल गया ; बिलकुल शांति छा गयी ; लोगों की जबान बंद हो गयी ; सभी अपने-अपने काम में लग गये ।

3). जब वाक्य और उपवाक्य/उपवाक्यों में बहुत अधिक संबद्धता न हो। जैसे —

(क) अब क्या करूँ ; वह रूठकर चला गया ।

(ख) किसे समझाऊँ , वह माननेवाला नहीं ; सिर्फ अपने मन की करता है ।

(3). पूर्णविराम ( । )

पूर्णविराम का अर्थ होता है , पूरा ठहराव। वाक्य की समाप्ति पर इस चिह्न का प्रयोग होता है। जैसे —

वह पढ़ रहा है ।                      राधा नाचेगी ।

(i) कभी-कभी किसी घटना का नाटकीय रूप या सजीव वर्णन करने के लिए इस चिह्न का प्रयोग होता है। जैसे — स्टेडियम में हजारों की भीड़ । अंतिम बॉल । अंतिम बल्लेबाज । चार रनों की जरूरत । सचिन का प्रवेश । और , यह रहा छक्का । हिन्दुस्तान की विजय ।

नोट — यह ध्यान रखें कि वाक्य की समाप्ति सिर्फ पूर्णविराम – चिह्न ( । ) से ही नहीं होती , वरन् प्रश्नवाचक या विस्मयादिबोधक – चिह्न से भी होती है। उनमें सिर्फ भाव और भाव के अनुसार चिह्न का अंतर होता है।

जैसे —

सीता सुंदर है ।        (स्वीकार के भाव की समाप्ति)

सीता सुंदर नहीं है । — (अस्वीकार के भाव की समाप्ति) सीता सुंदर है ?    

सीता सुंदर है ?  —   (प्रश्न के भाव की समाप्ति)

सीता सुंदर है !   —   (विस्मय के भाव की समाप्ति

(4). उपविराम ( : )

इस चिह्न का प्रयोग प्रायः पुस्तक , निबंध आदि के शीर्षक में होता है। जैसे —

(क) कश्मीर : ए ट्रेजडी ऑफ एरर्स (पुस्तक का नाम)।

(ख) विज्ञान : अभिशाप या वरदान (निबंध का शीर्षक)।

(5). प्रश्नवाचक-चिह्न ( ? )

इस चिह्न का प्रयोग प्रश्न पूछने, जिज्ञासा या संदेह आदि की स्थिति में होता है। जैसे —

1. प्रश्न के रूप में —

क्या आप पढ़ते हैं ?      आप क्या पढ़ते हैं ?

2. जिज्ञासा , उत्सुकता या संदेह की स्थिति में —

आप महेशजी के पुत्र हैं ?     

  गीता अच्छी लड़की है , है न ?

3. व्यंग्य के रूप में —

सिपाही — (चोर से) तू साधु है , है न ? 

चोरी तुमने नहीं , मैंने की है ?

4. यदि लेखक को शुद्ध – अशुद्ध का संदेह हो। जैसे —

दिनकर की पहली कविता का नाम रश्मिरथि (?) था।

1857 ई. के सिपाही-विद्रोह का नायक मंगल पाण्डेय (?) था।

नोट — ऐसे वाक्य जिनमें प्रश्न और उत्तर एक ही वाक्य में छिपे हों , तो वहाँ इस चिह्न का प्रयोग न करें। जैसे —

वह क्या पढ़ता है , मैं नहीं जानता ।

तुम कहाँ रहते हो , उसे पता है ।

(6). विस्मयादिबोधक-चिह्न ( ! )

इस चिह्न का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है

1). हर्ष , विषाद , घृणा , करुणा , आश्चर्य , भय , शोक आदि तीव्र भावों को व्यक्त करने में। जैसे —

वाह ! अच्छा किया !                   (हर्ष)

आह ! वह मर गया !                  (शोक)

बाप रे ! कितना भयानक शेर !     (आश्चर्य एवं भय)

छी ! छी ! ऐसा नीच काम !          (घृणा)

2). देवी , देवता , ईश्वर आदि के संबोधन में। जैसे —

हे ईश्वर ! उसका कल्याण करो ।

देवी ! मुझे शक्ति दो ।

3). अपने से छोटों के प्रति शुभकामना या सद्भावना प्रकट करने में। जैसे —

तुम्हारा कल्याण हो !          चिरंजीवी भव !

मुबारक हो !                     पुत्रवती भव !

(7). संयोजक – चिह्न ( – )

इस चिह्न का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है। हिन्दी और अँगरेजी के शब्दों में इसका प्रयोग होता है। जब दो शब्दों को जोड़ना हो , तो इस चिह्न का प्रयोग करें।

नोट — इस चिह्न के प्रयोग की चर्चा ” वर्तनी : नियम एवं संशोधन ” अध्याय में की गयी है।

(8). उद्धरण-चिह्न ( ”   ” ) या ( ‘   ‘ )

इस चिह्न का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है

1). जब किसी लेखक या पुस्तक की उक्ति को ज्यों – का – त्यों उद्धृत करना हो। जैसे — ‘ मैं तुम्हें देवता नहीं , मानव देखना चाहती हूँ ‘ – महादेवी वर्मा ।

2). किसी महत्वपूर्ण सूक्ति या किसी महान व्यक्ति के कथन में। जैसे — ” तुम मुझे खून दो , मैं तुम्हें आजादी दूंगा । ” — सुभाषचन्द्र बोस ।

3). पुस्तक का नाम , किसी व्यक्ति का उपनाम , गद्य या पद्य के शीर्षक आदि लिखते समय इस चिह्न का प्रयोग करें। जैसे — ‘ रामचरितमानस ‘ धार्मिक पुस्तक ही नहीं , एक महाकाव्य भी है । ‘ दिनकर ‘ राष्ट्रकवि थे। ‘

(9). कोष्ठक – चिह्न [ (  ) ]

इस चिह्न का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है

1). वाक्य में प्रयुक्त किसी पद या संपूर्ण वाक्य को स्पष्ट करने के लिए। जैसे —

जनकनंदिनी (सीता) को भी अग्निपरीक्षा देनी पड़ी । रावण (दुराचारी) के कारण लंका का सर्वनाश हो गया । मैं मांस नहीं खाता हूँ । (निषेधात्मक वाक्य)

2). नाटकीय संवादों में इसका प्रयोग होता है। जैसे — सिपाही — (डंडा पटकते हुए) क्या तुमने चोरी नहीं की ? चोर  — (हाथ जोड़कर) नहीं , माई – बाप ! मैंने चोरी नहीं की।

3). क्रमसंख्या को घेरने में इसका प्रयोग होता है। जैसे — वर्ण के दो भेद हैं — (क) स्वर वर्ण और (ख) व्यंजन वर्ण।

(10). निर्देश – चिह्न ( – )

इसका प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है —

1). किसी बात पर बल देने के लिए। जैसे

राम के दो पुत्र थे – लव और कुश ।

नेहरू ने कहा – आराम हराम है ।

2). लेखक, पुस्तक और उद्धरण के नाम के पहले। जैसे —

पोथी पढ़ि – पढ़ि जग मुआ , पंडित भया न कोय – कबीर।

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credit:Bhartiya Hindi Gyan

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